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जैन धर्म, जैन धर्म के संस्थापक कौन थे, जैन धर्म के सिद्धांत, जैन धर्म के प्रश्न, आदि।
ऋषभ देव या आदिनाथ को जैन धर्म के मूल संस्थापक माना जाता है, क्योंकि ये प्रथम तीर्थकर थे ।महावीर स्वामी को जैन धर्म का अंतिम संस्थापक माना जाता है, क्योंकि ये अंतिम या 24 वें तीर्थकर है। जैन शब्द संस्कृत के ‘जिन’ शब्द से बना है,जिसका अर्थ विजेता (जितेंद्रिय)।
जैन महात्माओं को निर्ग्रंथ(बंधन रहित)एवं जैन संस्थापक को तीर्थकर कहा गया। यह दो शब्दों से ‘तीर्थ’ एवं ‘कर’ से बना है।
‘तीर्थ’ का अर्थ उन विविध नियमों एवं उप नियमों से है, जो मानव को को इस भवसागर से पर उतार दे। एवं ‘कर’ का अर्थ करने वाला या बनाने वाला है।
जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे। ऋषभदेव का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थकर हुए है। 23 वें तीर्थकर पार्श्वनाथ थे। महावीर स्वामी 24 वें तीर्थकर थे।
महावीर स्वामी का जन्म कब हुआ-:
जन्म- 599ई०पू० या 540ई०पू०
स्थान-: वैशाली के पास कुंडग्राम में
पिता का नाम-: सिद्धार्थ
माता का नाम-: त्रिशला या विदेहदत्ता
पत्नी का नाम-: यशोदा ( कुंडिनीय गोत्र की कन्या)
मृत्यु-: 527ई०पू० पावा में
महावीर स्वामी का जीवन परिचय-:
महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था। जैन अनुश्रुतियों मे इनके पिता सिद्धार्थ के दो अन्य नाम श्रेयाम्स एवं यसामस मिलते है। महावीर स्वामी के पिता माता जी का दो नाम मिलता है। प्रथम प्रियकारणी एवं दूसरा विदेहदत्ता मिलता है।
जैन धर्म के संस्थापक कौन थे -:
जैन अनुश्रुतियों से पता चलता है की महावीर स्वामी पहले ब्राह्मण कुल में ऋषभदत्त की पत्नी देवनन्दा के गर्भ में थे। उसके इन्द्र ने इन्हे त्रिशला के गर्भ में विस्थापित कर दिया।
महावीर स्वामी की पत्नी यशोदा से इनकी पुत्री अणोज्या या प्रियदर्शना पैदा हुई, जिसका विवाह महावीर स्वामी की बहन सूदर्शना के पुत्र जमाली से हुआ था।
महावीर स्वामी ने कितने वर्ष घोर तपस्या की -:
महावीर स्वामी के पिता की मृत्यु के पश्चात इनके बड़े भाई नंदिवर्धन राजा हुए। बड़े भाई से अनुमति लेकर ३० वर्ष की आयु में तपस्या करने घर से निकल पड़े। नालंदा में इनकी भेंट मखकलीपुततगोशाल नामक सन्यासी से हुई। वह उनका शिष्य बन गया। 6वर्ष बाद उनका साथ छोड़ कर आजीवक नामक नए संप्रदाय की स्थापना की।
महावीर स्वामी के 12वर्ष के घोर तपस्या पश्चात वैशाख मास के 10 वें दिन जृंभिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर एक वर्ष वृक्ष के नीचे उन्हें कैवल्य(ज्ञान) प्राप्त हुआ।
ज्ञान के प्राप्त के बाद महावीर स्वामी को केवलिन जिन(विजेता), अर्हत(योग्य), एवं निर्ग्रंथ (बंधन रहित) कहे गए।
महावीर स्वामी को महावीर की उपाधि कैसे मिली-:
महावीर को अपनी तपस्या(साधना) में अटल रहने एवं अतुल पराक्रम दिखने के कारण उन्हें ‘महावीर’ कहा गया।
महावीर का प्रथम उपदेश-:
ज्ञान प्राप्त के बाद महावीर स्वामी ने अपना प्रथम उपदेश राजगृह में विपुलाचल पहाड़ी पर वाराकर नदी के तट पर दिया।
महावीर स्वामी का प्रथम शिष्य-:
महावीर स्वामी का प्रथम शिष्य जामाता जमालि बना। वैशाली के राजा चेटक जो इनके मामा थे, वह भी इनके शिष्य बने। समकालीन प्रमुख शासक जैसे- बिम्बसार, अजातुशत्रु,उदयन आदि की आस्था जैन धर्म में थी।
जैन धर्म की शिक्षा-:
जैन धर्म में दुनिया को दुख मूलक माना गया है। मानव वृद्धावस्था(जरा) एवं मृत्यु से ग्रस्त है। मानव को संसार की सुख सुविधाओं की इच्छाएं चारों तरफ से घेरे रहती है। दुनिया त्याग एवं सन्यास की मनुष्य को सच्चे सुख की तरफ ले जाता है।
जैन धर्म के अनुसार सृष्टिकर्ता ईश्वर नहीं है, परंतु संसार को एक वास्तविक तथ्य माना गया है, जो अन्यदिकाल से विद्यमान है। संसार के सभी मानव अपने-अपने संचित कर्मों के अनुसार ही कर्मफल भोगते है। कर्मफल ही जन्म और मृत्यु का कारण है। कर्मफल से ही छुटकारा पाकर मानव निर्वाण की तरफ अग्रसर होता है।
जैन धर्म के त्रिरत्न-:
मानव को पूर्व जन्म के कर्मफल को समाप्त करने एवं वर्तमान जीवन में कर्मफल से विमुख रहें, इसके लिए त्रिरत्न की आवश्यकता है, जो निमन्वत है-
- सम्यक दर्शन
- सम्यक ज्ञान
- सम्यक आचरण
सम्यक दर्शन-: सत् में विश्वास को सम्यक दर्शन कहा गया है।
सम्यक ज्ञान-:सदरूप का शंकाविहीन एवं वास्तविक ज्ञान सम्यक ज्ञान कहलाता है।
सम्यक आचरण-: सांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख-दुख के प्रति समभाव सम्यक आचरण कहलाता है।
जैन धर्म के पाँच महावर्त-:
जैन धर्म में मोक्ष प्राप्त के लिए पाँच महावर्त को चित्रित किया गया है, जो निम्न है-:
- अहिंसा-: जैन धर्म में अहिंसा संबंधी सिद्धांत बहुत ही कठोर है। मन, वचन, एवं कर्म से किसी के प्रति असंगत व्यवहार हिंसा है।
- सत्य-: मानव को सदा सत्य एवं मधुर बोलना चाहिए।
- अस्तेय-: बिना आज्ञा के न तो किसी वस्तु का ग्रहण करना चाहिए। और ना ही इसकी इच्छा करनी चाहिए। बिना किसी आज्ञा के घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
- अपरिग्रह-:इसके अंतर्गत किसी भी प्रकार की संपत्ति एकत्रित न करने पर प्रधानता दिया गया है।
- ब्रह्मचर्य-: इसके अंतर्गत किसी महिला से बातचीत करना, उसे देखना, उससे संसर्ग का ध्यान करने की मनाही थी।
इसमें पूर्व के चार व्रत पार्श्वनाथ के समय ही प्रचलित थे। पांचवें व्रत ब्रह्मचर्य को जोड़ा है।
जैन धर्म में अणुव्रत-:
जैन धर्म के जैनियों को गृहस्थ जीवन जीने वाले को इन्ही व्रतों की व्यवस्था है। और इनकी कठोरता में काफी कमी की गई है, इसलिए इन्हे अणुव्रत कहा गया है।
जैन धर्म में तीन गुणवर्त-: जैन धर्म में और तीन गुणव्रत के बारें चर्चा की गई है।
- प्रत्येक गृहस्थ को को सुविधानुसार अपने कार्यक्षेत्र की सीमा निर्धारित करनी चाहिए।
- केवल योग्य एवं अनुकरणीय कार्य करें।
- भोजन एवं भोग की सीमा निर्धारित करके उसका उल्लंघन न करें।
जैन धर्म में चार शिक्षा व्रत की भी व्यवस्था की गई है, जो निमन्वत है-
- देशविरति-: किसी देश,प्रदेश के बाहर न जाना।
- सामयिक व्रत-: दिन में तीन बार सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर ध्यान लगाना।
- प्रोपोद्योपवास-: उपवास व्रत करना।
- वैया व्रत-: दान पूजा आदि करना।
जैन धर्म में कायाक्लेश-:
जैन धर्म में काया-क्लेश पर अत्यधिक जोर दिया गया है, इसके अंतर्गत उपवास द्वारा आत्म हत्या का भी विधान है। इस पद्धति को संलेखना पद्धति एवं निषिद्ध कहा जाता है।
जैन अनुश्रुति के आधार पर चन्द्रगुप्त मौर्य ने श्रवणबेलगोला (मैसूर) में इसी पद्धति से प्राण त्यागा था।
जैन दर्शन-:
जैन दर्शन के अनुसार संसार का वास्तविक कारण ईश्वर नहीं है। संसार वास्तविक और सत्य एवं अनेक चक्रों में बंटा हुआ है। एवं प्रत्येक चक्र की दोन अवधियाँ है-
- उत्सर्पणी अर्थात विकास की अवधि
- अवसर्पणी अर्थात ह्रास की अवधि
जैन धर्म में 24 तीर्थकर एवं 63 शलाका पुरुष है निवास करते है। यह संसार जीव(चेतन) एवं अजीव(जड़) से बना है। अजीव को भी 5 भागों में बाँटा गया है- पूद्रल, काल, आकाश, धर्म, एवं अधर्म।
जैन तीर्थकरों के अनुसार जीव में तत्वों के प्रकार-:
जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव में दो प्रकार के तत्व पाए जाते है, एक है आत्मा एवं दूसरा इसको घेरने वाला भौतिक तत्व।
- आत्मा-: जीव का परम लक्ष्य है की आत्मा को भौतिक तत्व से मुक्त रखना।
- भौतिक तत्व-: यह जीवन में वीकर एवं भ्रम पैदा करता है।
जैनियों के अनुसार कर्म बंधन का कारण है, अज्ञानता के कारण कर्म जीव की तरफ आकर्षित होने लगता है, इसे आस्रव कहा जाता है।
कर्म का जीव के साथ जुड़ जाना बंधन कहलाता है। त्रिरत्नों का अनुसरण करने से कर्म का जीव की तरफ बहाव रुक जाता है। जिसे सवर कहा जाता है।
पहले से व्याप्त कर्म समाप्त हो जाए तो उस अवस्था को निर्जरा कहा जाता है।
जैन धर्म के संस्थापक के अनुसार ज्ञान-:
जैन धर्म में विभिन्न प्रकार के ज्ञान का वर्णन किया गया है।
- इंद्रिय जनित ज्ञान को मति कहा जाता है।
- श्रवण जनित ज्ञान को श्रुति कहा जाता है।
- दिव्य ज्ञान को अवधि कहा जाता है।
- दूसरे व्यक्ति के मन की बात को जानने वाले को मनःपर्याय कहा जाता है।
- पूर्ण एवं सर्वश्रेष्ठ ज्ञान को कैवल्य कहा जाता है।
जैन स्याद्वाद या अनेकांतवाद-:
जैन धर्म के लोग परम तत्व की व्याख्या के लिए सप्तभंग न्याय की कल्पना की है। इसे स्पतभंगनीय कहलाता है। जो बिभिन्न प्रकार से है-
- स्यात अस्ति- शायद है।
- स्यात नास्ति- शायद नहीं है।
- स्यात अस्ति च नास्ति- शीद है और नहीं है।
- स्यात अव्यक्तम- शायद कहा नहीं जा सकता है।
- स्यात अस्ति च अव्यक्तम- शायद है किन्तु कहा नहीं जा सकता है।
- स्यात नास्ति च अव्यक्तम- शायद नहीं है और कहा नहीं जा सकता।
- स्यात अस्ति च नास्ति च अव्यक्तम च- शायद है, नहीं है, और कहा नहीं जा सकता।
जैन धर्म का प्रचार-:
महावीर स्वामी ने अपने जीवनकाल में ही 11 अनुयायियों के एक संघ की स्थापना की। ये गणधर कहे गए। जिन्हे अलग-अलग समूहों के अध्यक्ष बनाए गए। गणधरों के नाम- इन्द्र भूति, अग्निभूति, वायुभूति, व्यक्त, सुधर्मन, मंडित, मोरियपुत्र, अंकपित, अचलभ्राता, मेयत्री, प्रभाष, है।
इन्द्रभूति एवं सुधर्मन को छोड़कर सभी की मृत्यु महावीर स्वामी के जीवनकाल में हो गई थी।
महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद जैन संघ का प्रथम अध्यक्ष-:
महविर स्वामी की मृत्यु के बाद सुधर्मन संघ का प्रथम अध्यक्ष बना। सुधर्मन की मृत्यु के बाद जम्बू 44 वर्ष तक जैन संघ का अध्यक्ष बना रहा है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने श्रवणबेलगोला में संलेखना पद्धति से अपने प्राण त्यागे थे।
जैन धर्म का विकास -:
महावीर स्वामी के समय में जैन धर्म का काफी विकास हुआ है। मौर्यकाल के पहले नंदवंश का प्रातपी शासक महापदमनन्द कट्टर जैन धर्मानुयायी था। चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में पतिलपुत्र में प्रथम जैन संगीत का आयोजन हुआ, इसके अध्यक्ष स्थूलभद्र थे। कलिंग नरेश खारवेल कट्टर जैन अनुयायी था। उसके हाथीगुंफा अभिलेख में जैन धर्म का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य मिलता है।
पूर्व-मध्यकाल में राष्ट्रकूट, गंग, गुजरात, के चालकयु एवं चंदेल शासकों ने जैन धर्म को प्रशय दिया। गंग वंश के राजा राजमल चतुर्थ का मंत्री एवं सेनापति चामुंडराय ने 974ई० में श्रवणबेलगोला के पास एक बाहुबली जिन मूर्ति का निर्माण करवाया, जो गोमतेश्वर की मूर्ति कहलाती है। हेमचन्द्र ने परिशिष्ट प्रवण नामक जैन ग्रंथ की रचना की। चंदेल शासक ढंग के शासनकल में में खजुराहो में जैन मंदिरों का निर्माण हुआ। विमल शाह ने दिलवाड़ा के प्रसिद्धि जैन मंदिर का निर्माण कराया, एवं इसके गर्भ गृह में ऋषभदेव या आदि नाथ की मूर्ति है।
जैन धर्म के संस्थापक के अनुसार जैन धर्म दो संप्रदायों में विभक्त था।
- श्वेताम्बर
- दिगम्बर
श्वेताम्बर-: मगध में रहने वाले स्थूलभद्र के अनुयायी श्वेत वस्त्र धारण करने के कारण वे श्वेतताम्बर कहलाये। भद्रबाहु के अनुयायी दिगम्बर कहलाये।
- श्वेताम्बर जैनियों को यति, आचार्य, एवं साधु कहा जाता है।
- दिगम्बर जैनियों को झुल्लक, ऐलक खलए।
- श्वेताम्बर अनुयायी भोजन आवश्यक समझते है।
- दिगम्बर संप्रदाय के अनुयायी ज्ञान प्राप्त के बाद भोजन की आवश्यकता नहीं होती है।
कालांतर में श्वेताम्बर एवं दिगम्बर बिभिन्न संप्रदायों में बंटे हुए है-
श्वेताम्बर के उप संप्रदाय-:
- पूजेरा या डेरावासी-:इनको मंदिर मार्गी भी कहा जाता है।
- ढूढ़िया या स्थानक वासी-: ये मूर्ति पूजक नहीं थे, केवल जैन सिद्धांतों का पालन करते थे।
दिगम्बर के उपसंप्रदाय-:
- बीस पंथी- मंदिर में तीर्थकरों की मूर्तियों के साथ-साथ क्षेत्रपाल एवं भैरव की मूर्तियों को भी रखते थे।
- तेरापंथी-: ये केवल जैन मूर्तियों की पूजा करते थे।
- समैयपंथी या तारणपंथी-: ये लोग मूर्तिपूजक नहीं थे, केवल जैन सिद्धांतों को मानते थे।
जैन धर्म के संस्थापक के अनुसार महावीर की जैन सभा-: महावीर की जैन शिक्षाओं को साहित्यों में संकलित करने के लिए दो जैन सभाओं का आयोजन हुआ-
प्रथम जैन सभा-:
समय-: चतुर्थ शताब्दी ई०पू०
स्थान- पाटलिपुत्र
अध्यक्ष- स्थूलभद्र
- इस सभा में जैन धर्म के १२ अंगों का संकलन किया गया। परंतु भद्रबाहु के अनुयायी ने भाग नहीं लिया। इसी सभा में जैन धर्म का विभाजन श्वेताम्बर एवं दिगम्बर नामक दो संप्रदाय कहलाये। स्थूलभद्र के अनुयायी श्वेताम्बर एवं भद्रबाहु के अनुयायी दिगम्बर कहलाये।
- गिरनार श्वेताम्बर संप्रदाय का एक प्रमुख केंद्र था।
द्वितीय जैन सभा
समय- 513 या 526ई०
स्थान – बल्लभी
अध्यक्ष- देवरधिगण या क्षमाश्रमण
- इसी जैन साहित्य में 12 यंग, 12 उपांग,10 प्रकीर्ण, 6 छेद सूत्र, 4 मूल सूत्र एवं अनुयोग सूत्र का संकलन हुआ है।
जैन धर्म की देन- जैन धर्म की प्रमुख देन साहित्य एवं कला के क्षेत्र में है।
जैन धर्म के साहित्य-: जैन धर्म के प्राचीनतम ग्रंथों को ‘पूब्व’ कहा जाता है। इनकी संख्या 14 है। ये ग्रंथ अर्धमागधी या मागधी में लिखे गए है। इसके अंतर्गत 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6छेद, 4 मूल सूत्र एवं अनुयोग सूत्र।
जैन धर्म के सिद्धांत-:
जैन धर्म के सिद्धांत के अंतर्गत 12 अंगों का वर्णन है जो निम्न प्रकार के है-
- आचराङ्ग सुत्त- इसमे जैन धर्म के भिक्षुओं द्वारा अनुसरण किए जाने वाले नियमों का वर्णन है।
- सूत्र कृदंग-: इसमे बिभिन्न जैन मतों का वर्णन है।
- स्नान्ग-: जैन धर्म के बिभिन्न सिद्धांतों का वर्णन है।
- समवायांग-: इसके अंतर्गत भी बिभिन्न जैन सिद्धांतों का वर्णन है।
- भगवती सूत्र-: यह महत्त्वपूर्ण जैन ग्रंथ है। इसके अंतर्गत अनेक समकलीन जैन मुनियों की जीवन गाथाओं का वर्णन है। इसके अतिरिक्त जैन धर्म के सिद्धांतों के साथ- साथ स्वर्ग एवं नरक का वर्णन है।
- ज्ञान धर्म कथा-: इसमें कथाओं, पहेलियों एवं आख्यायिकाओं के माध्यम से जैन धर्म की शिक्षाओं का वर्णन है।
- उवासग दसाओं-: इसमें 10 जैन व्यापारियों का वर्णन है, जिन्होंने जैन धर्म के नियमों का पालन करके मोक्ष प्राप्त किया था।
- अंतकृदशा-: इसके अंतर्गत कुछ भिक्षुओं का वर्णन है। जिन्होंने तपस्या के द्वारा प्राण त्याग करके मोक्ष प्राप्त किया था।
- अनुत्तरोपातिक दशा-: इस ग्रंथ में भी मोक्ष प्राप्त करने वाले जैन मुनियों का वर्णन है।
- प्रश्न व्याकरण-: इसमें प्रश्नोत्तर रूप में जैन धर्म की 10 शिक्षाओं एवं 10 निबंधों का उल्लेख है।
- विकाक श्रुतम-: इसमें जीवन के अच्छे बुरे कर्मों से मिलने वाले फलों का कथाओं के माध्यम से वर्णन है।
- दृष्टिवाद-: यह जैन ग्रंथ प्रमुख रूप से उप लब्ध नहीं है। इसे प्रथम तीर्थकर से लेकर स्थूलभद्र के काल तक वर्णन है।
12 उपांग-:
प्रत्येक यंग के साथ एक उपांग सम्बद्ध होता है। इनमें ब्रह्मांड का वर्णन है, प्राणियों का वर्गीकरण, खगोल विद्या, काल विभाजन, मरणोत्तर जीवन आदि का उल्लेख है। उपांग का विवरण निमन्वत है-
- औपचारिक
- प्रज्ञापना
- चंद्रप्रज्ञप्ति
- जंबूदवीप प्रज्ञप्ति
- सूर्य प्रज्ञप्ति
- निरयावली
- कल्पवतनसिक
- राजप्रश्निक
- जीवभीगम
- पुष्पिका
- पुष्पचुलिका
- वृष्ि ण दशा
10 प्रकीर्ण-:
प्रकीर्ण प्रमुख ग्रंथों के परिशिष्ट है, इसमें जैन धर्म से संबंधित विधि विषयों का वर्णन है। जो की निमन्वत है-
- चतुः शरण
- संस्तारक
- तंडुल वैचारिक
- चंद्र वैधयक आतुर प्रख्यानम
- गणित विद्या
- देवेंद्रस्तव
- वीरसत्व
- महाप्रख्यान
- भक्त परिज्ञा
छेद-:
जैन धर्म के इन सूत्रों में भिक्षु-भिक्षुणीयों के नियमों का वर्णन है-:
- छेद सूत्र
- जिनत कल्प सूत्र
- वृहतकल्प सूत्र
- निशीथ सूत्र
- महानिशीथ सूत्र
- दशाश्रुतस्कन्ध सूत्र
अनुयोग सूत्र-:
इसके अंतर्गत भिक्षुओं के लिए आचरणीय बातें लिखी गई है।
अन्य जैन धर्म ग्रंथ-:
- न्यायधममखा-: इसमें महावीर स्वामी की शिक्षाएं संगृहीत है।
- कल्पसूत्र- यह भद्रबाहु द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है ।
- परिशिष्ट पर्वन-: प्राकृत अपभ्रंश में हेमचन्द्र द्वारा लिखित है।
पार्श्वनाथ-
पिता- अश्वसेन ( काशी के राजा)
माता- वामा (कौशस्थल के राजा नर्वरमन की पुत्री)
पत्नी- प्रभावती
- ये 23 वें तीर्थकर थे।
- इन्होंने 30 वर्ष की उम्र में घर त्याग कर घोर तपस्या के बाद इन्हें समेत पर्वत पर ज्ञान प्राप्त हुआ।
- जैन धर्म में पार्श्वनाथ को पुरुषादनीयम कहा गया है।
- इनके अनुयायी को निर्ग्रंथ कहा गया है।
- पार्श्वनाथ ने स्त्रियों को भी अपने धर्म में शामिल किया, क्योंकि जैन ग्रंथ में स्त्री संघ की अध्यक्ष पुष्पचूला का वर्णन मिलता है।
- इन्होंने वैदिक कर्मकांड एवं देववाद किया आलोचना की है।
- जाति प्रथा पर भी प्रहार किया है।
पार्श्वनाथ के अनुसार चार प्रकार से आचरण पालन करने को कहा-
- सत्य-: सदा सत्य बोलना
- अहिंसा-: प्राणियों की हिंसा न करना।
- अस्तेय-: चोरी न करना।
- अपरिग्रह-: संपत्ति न रखना।
जैन तीर्थकरों के संज्ञान अथवा प्रतीक-:
तीर्थकर | प्रतीक |
ऋषभदेव या आदिनाथ | वृषभ |
अजितनाथ | गज |
संभवनाथ | अश्व |
अभिनंदन नाथ | कपि |
सुमति नाथ | क्रौंच |
पद्यम प्रभु | पद्यम |
सुविधि नाथ | मकर |
शीतल नाथ | श्रीवत्स |
श्रेयन्स नाथ | गैंडा |
पूज्य नाथ | महिष |
विमल नाथ | वाराह |
अनंत नाथ | श्येन |
धर्म नाथ | वज्र |
शांति नाथ | मृग |
कुंकु नाथ | अज |
अर नाथ | मीन |
मल्लि नाथ | कलश |
मुनि सुब्रत | कूर्म |
नेमि नाथ | नीलोत्पल |
अरिष्टि नेमि | शंख |
पार्श्वनाथ | सर्प फ़र्ण |
महावीर | सिंह |
जैन धर्म के प्रश्न-:
प्रश्न1-: जैन धर्म के संस्थापक कौन है ?
उत्तर-: ऋषभदेव या आदिनाथ
प्रश्न 2-: जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर कौन थे?
उत्तर-: ऋषभदेव
प्रश्न 3-: महावीर स्वामी का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर-: महावीर स्वामी का जन्म कुंडग्रम या कुंडल पुर में हुआ था।
प्रश्न 4-: महावीर स्वामी की मृत्यु किस नगर में हुई?
उत्तर-: महावीर स्वामी की मृत्यु पावापुरी में हुई।
प्रश्न 5-: तीर्थकर शब्द किससे संबंधित है?
उत्तर- जैन धर्म से।
प्रश्न 6-: जैन धर्म का आधारभूत बिन्दु क्या है?
उत्तर-: अहिंसा
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