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बाल विकास का अर्थ आवश्यकता एवं क्षेत्र
बालमनोविज्ञान

बाल विकास का अर्थ आवश्यकता एवं क्षेत्र

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बाल विकास का अर्थ आवश्यकता एवं क्षेत्र आदि।

विकास एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। जो संसार के प्रत्येक जीव में पाई जाती है। विकास की यह प्रक्रिया गर्भधारण से लेकर मृत्यु पर्यंत तक किसी न किसी रूप में चलती रहती है।

बाल विकास का अर्थ आवश्यकता एवं क्षेत्र

बाल मनोविज्ञान-: मानव विकास का अध्ययन मनोविज्ञान की जिस शाखा के अंतर्गत ककिया जाता है, उसे बाल मनोविज्ञान कहा जाता है।

बाल विकास का अर्थ-:

बाल विकास मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में विकसित हुआ है। इसके अंतर्गत बालकों के व्यवहार स्थितियाँ, समस्याएं, एवं उन सभी कारणों का अध्ययन कियाय जाता है, जिनका प्रभाव बालक के व्यवहार पर पड़ता है।

बाल मनोविज्ञान की परिभाषाएं-:

क्रो और क्रो के अनुसार-: बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक अध्ययन है, जो व्यक्ति के विकास का अध्ययन गर्भकाल के प्रारंभ से किशोरावस्था की प्रारम्भिक अवस्था तक रहता है।

जेम्स ड्रेवर के अनुसार-: बाल मनोविज्ञान मनोविज्ञान की वह शाखा है, जिसमें जन्म से परिपकवावस्था तक विकसित हो रहें मानव का अध्ययन किया जाता है।

हरलॉक के अनुसार-: आज बाल विकास में मुख्यतः बालक के रूप व्यवहार, रुचियों और लक्ष्यों में होने वाले उन विशिष्ट परिवर्तनों की खोज पर बल दिया जाता है, जो उसके एक विकसात्मक अवस्था से दूसरी विकसात्मक अवस्था में प्रदार्पण करते समय होते है। बाल विकास यह खोज करने का भी प्रयास किया जाता है। की यह परिवर्तन कब होते है , इसके क्या कारण है और यह वैयक्तिक है या सार्वभौमिक।

बाल विकास की आवश्यकता-:

बाल विकास अनुसंधान का एक क्षेत्र माना जाता है। बालक के जीवन को सुखी और स्मरिधशाली बनाने में बाल मनोविज्ञान का योगदान प्रशंसनीय है। मनोविज्ञान की इस शाखा का केवल बालकों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंध है, जो बालकों की समस्याओं पर विचार करतें है और बाल मनोविज्ञान की उपयोगिता को स्वीकार करते है।

समाज के बिभिन्न लोग बाल मनोविज्ञान से लाभान्वित हो रहे है। जैसे- बालक के माता- पिता अभिभावक, बालक के शिक्षक,बाल सुधारक, एवं बाल चिकित्सक आदि।

हम निर्देशन के द्वारा ही बालकों की क्षमताओं और अभिवृति का उचित रूप से लाभ उठा सकते है।

बाल विकास के क्षेत्र-:

बाल विकास के क्षेत्र में गर्भधारण अवस्था से युवावस्था तक के मानव की सभी व्यवहार संबंधी समस्याएं जुड़ी है। बाल विकास विषय के क्षेत्र के अंतर्गत जिन समस्याओं या विषय सामग्री का अध्ययन किया जाता है, वह निम्न प्रकार के है-

  • वातावरण-: बाल विकास में इस समस्या के अन्तर्गत दो प्रकार की समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।बालक का वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है।यह की वातावरण बालक के व्यवहार व्यक्तित्व एवं शारीरिक विकास आदि को किस प्रकार प्रभावित करता है।
  • वैयक्तिक भिन्नता-: बाल विकास में वैयक्तिक भिन्नताओं एवं इससे संबंधित समस्याओं का अध्ययन किया जाता है। जैसे शरीर रचना संबंधी भेद, मानसिक योग्यता संबंधी भेद, संवेगिक भेद, व्यक्तित्व संबंधी भेद, सामाजिक व्यवहार संबंधी भेद एवं भाषा विकास संबंधी भेद।
  • मानसिक प्रक्रिया-: बाल विकास में बालक की विभिन्न मानसिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। जैसे- प्रत्यक्षीकरण, सीखना, कल्पना, स्मृति, चिंतन साहचर्य आदि।
  • बालक-बालिकाओं का मापन-: बाल विकास के क्षेत्र में बालकों की विभिन्न मानसिक और शारीरिक मापन तथ मूल्यांकन से संबंधित समस्याओं का अध्ययन भी किया जाता है। मापन से तात्पर्य है की इन क्षेत्रों में उसकी समस्याएं क्या है, और उनका निराकरण कैसे किया जाता है।
  • बाल व्यवहार एवं अन्तःक्रियाएं-: बाल विकास के अध्ययन क्षेत्र में अनेक प्रकार की अन्तः क्रियाओं का अध्ययन भी होता है। बालक व्यवहार गतिशील होता है, एवं उसकी विभिन्न शारीरिक और मानसिक योग्यताओं और विशेषताओं में क्रमिक विकास होता है।
  • समायोजन संबंधी समस्याएं-: बाल विकास में बालक के विभिन्न प्रकार की समायोजन समस्याओं का अध्ययन भी किया जता है। साथ इस समस्या का भी अध्ययन किया जाता है। की भिन्न-भिन्न समायोजन जैसे- पारिवारिक, संवेगात्मक, शैक्षिक। स्वास्थ्य आदि।
  • विशिष्टि बालकों का अध्ययन-: जब बालक की शारीरिक एवं मानसिक योग्यताओं और विशेषताओं का विकास दोषपूर्ण ढंग से होता है, तो बालक के व्यवहार और व्यक्तित्व में असमान्यता के लक्षण उत्पन्न जाते है। बाल विकास में इन विभिन्न असंयंताओं व् इनके कारणों और गतिशीलता का अध्ययन होता है।
  • अभिभावक बालक संबंध-: बालक के व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में अभभवक और परिवार की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अभिभावक-बालक संबंध का विकास, अभिभावक, बालक संबंधों के निर्धारक, पारिवारिक संबंधों में ह्रास आदि अमस्याओं का अध्ययन बाल विकास मनोविज्ञान के क्षेत्र के अंतर्गत किया जाता है।

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