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बाल विकास की अवस्थाएं
बालमनोविज्ञान

बाल विकास की अवस्थाएं

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बाल विकास की अवस्थाएं, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, बुद्धि और बुद्धि लब्धि आदि।

बाल विकास की अवस्थाएं : बाल विकास की अवस्था को प्रमुख वैज्ञानिकों ने शैशवावस्था(जन्म से 05वर्ष) तक, बाल्यावस्था(05वर्ष से 12वर्ष) तक एवं किशोरावस्था (12वर्ष से 18वर्ष) तक को तीन भागों में बाँटा है। मानव का विकास निश्चित अवस्थाओं में होता है। विकास की प्रत्येक अवस्था की विशेषताएं होती है।

बाल विकास की अवस्थाएं

बाल विकास की अवस्थाएं में क्रमिक रूप से विकास होता रहता है, जिसे तीन भागों में विभाजित किया गया है।

  • शैशवावस्था(जन्म से 05वर्ष) तक
  • बाल्यावस्था (05वर्ष से 12वर्ष) तक
  • किशोरावस्था (12वर्ष से 18वर्ष) तक

बाल विकास की अवस्थाएं में बालक के शारीरिक विकास-:

शैशवावस्था में शारीरिक विकास( Physical Development in Infancy)-:

शैशवावस्था जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवस्था है। शिशु का शारीरिक विकास जन्म के पूर्व गर्भावस्था से ही शुरू हो जाता है। इस समय माता के खान-पान रहन-सहन,स्वास्थ्य एवं उसकए संवेगात्मक संतुलन पर विशेष ध्यान देना चाहिए जन्म के बाद शैशवावस्था में विकास के दो चरण हो जाते है।

  • जन्म से 03वर्ष
  • 03वर्ष से 05वर्ष

एडलर महोदय के अनुसार“जन्म के कुछ कमह बाद ही ये निश्चित किया जा सकता है, की जीवं में उसका क्या स्थान है”।

  • भार (Weight)- जन्म के समय एवं पूरी शैशवावस्था में बालक का भार बालिका के भार से अधिक होता है। जन्म के समय बालक का भार लगभग 7.15 पौंड एवं बालिका का भार लगभग 7.13 पौंड होता है। प्रथम 6 माह में शिशु का भार दुगुना एवं एक वर्ष के आखिरी में तीन गुना हो जाता है।
  • लंबाई-: शैशवावस्था में 3वर्ष तक बच्चों के विकास की गति अत्यंत तीव्र होती है। जन्म के समय शिशु की लंबाई औसत रूप से 50 सेमी० होती है। प्रथम वर्ष के अंत में वह 67 सेमी० से 70 सेमी०, दूसरे वर्ष के अंत तक 77 सेमी० से 82 सेमी० तक होती है, एवं 6 वर्ष तक लगभग 100 सेमी०  से 110 सेमी०  तक लंबा हो जाता है।
  • सिर व् मस्तिष्क Head and Brain)- नवजात शिशु की सिर की लंबाई उसकए शरीर के कुल लंबाई की 1/4 होती है। पहले 2 वर्षों में सिर बहुत तीव्र से गति बढ़ता है। एवं उसका भार शरीर के भार के अनुपात से अधिक होता है।
  • हड्डियाँ (Bons)- नवजात शिशु की हड्डियाँ छोटी एवं संख्या में 206 होती है। सम्पूर्ण शैशवावस्था में ये छोटी,कोमल,लचीली होती है। हड्डियाँ कैल्शियम,फास्फोरस और अन्य खीज लवण की सहायता से मजबूत होती है। इस आयु में शिशुओं के भोजन में इन लवणों की अधिकता होनी चाहिए।
  • मांस पेशियाँ (Muscles)- शिशु की मांस पेशी का भार उसके शरीर के कुल भाग का 23% होता है। यह भार धीरे-धीरे बढ़त चला जाता है। उसकी भुजाओं का विकास तीव्र गति से होता है। प्रथम दो वर्षों में भुजायें दुगनी और टंगे डेढ़ गुनी हो जाती है। 6 वर्ष तक मांस पेशी में लचीलापन होता है।
  • अन्य अंग (other organs)- 6 माह में दूध के दाँत निकलं शुरू हो जात है। सबसे पहले नीचे के अबले दाँत निकलते है। और एक वर्ष की आयु तक उनकी संख्या 8 हो जाती है। लगभग 4 वर्ष तक दूध के सभी दाँत निकल आते है। नवजात शिशु का सिर शरीर की अपेक्षा बड़ा होता है। जन्म के समय हृदय की धड़कन कभी तेज व् कभी धीमी होती है। जिस तरह से हृदय बड़ा होता जाता है, उसी प्रकार से हृदय में स्थिरता आती जाती है। शिशु के आंतरिक अंग जैसे- पाचन अंग,फेफड़ा स्नायु मण्डल, संचार अंग, जनन अंग एवं ग्रंथियां ) का विकास तीव्र गति से होता है।

“शैशवावस्था के प्रथम तीन वर्ष विकास के काल होते है”।

शैशवावस्था में मानसिक विकास-:

जन्म के समय शिशु का मस्तिष्क पूर्णतया अविकसित होता है। वह अपने वातावरण को नहीं समझता। जैसे-जैसे उसका मस्तिष्क विकसित होता जाता है, उसको अपने वातावरण के बारें ज्ञान होने लगता है।

  • जन्म से 3 माह तक बच्चा केवल अपना हाथ-पैर हिलाता है। भूख लगने पर रोता है। हिचकी लेना, दूध पीना, कष्ट का अनुभव करना। चमकती हई वस्तु की तरफ आकर्षित होता है।
  • 4 से 6 महीने तक शिशु सभी प्रकार की व्यंजन ध्वनियाँ करता है।
  • वस्तु को पकड़ने का प्रयास करता है
  • सुनी हई आवाज का अनुकरण करता है। तथा अपना नाम समझने लगता है।
  • 7 से 9वें महीने तक घुटने के बल चलना एवं सहारे से खड़ा होना प्रारंभ कर देता है।
  • 10 माह से 1वर्ष तक वह बोलने का अनुकरण करने लगता है।
  • दूसरे वर्ष से वह वाक्य शब्द बोलें लगता है।
  • 3 वर्ष से उसका नाम पूछने पर बताने लगता है। कहानी अथवा कविता सुनने लगता है। अपने यंग को पहचानने लगता है।
  • 4 से 5 वर्ष तक गिनती लिखना, अक्षर लिखना जानने लगता है।
  • 5 वें वर्ष तक शिशु हल्की भारी वस्तु में अंतर करने लगता है।

बाल्यावस्था में शारीरिक विकास-:

“बाल्यावस्था को जीवन का अनोखा काल कहा जाता है”। बाल्यावस्था 06वर्ष से 12 वर्ष तक मानी जाती है। बाल्यावस्था को भी समझने के लिए इसे दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम के तीन के वर्ष 06वर्ष से 09वर्ष तक में बच्चे का शारीरिक विकास बहुत तेजी से होता है। और अंतिम के तीन वर्ष में शारीरिक विकास में स्थिरता आ जाती है।

  • भार (Weight)- इस अवस्था में बालक के भार में पर्याप्त वृद्धि होती है। 9 या 10 वर्ष आयु तक बालक का भार बालिकाओं से अधिक होता है। इसके बाद बलोकाओं का भार अधिक होने लगता है।
  • लंबाई (Length)- बाल्यावस्था में शरीर की लंबाई कम बढ़ती है, इन सब वर्षों में लंबाई 2 अथव 3 इंच ही बढ़ती है।
  • हड्डियाँ (Bons)- बाल्यावस्था के पहले 4 से 5 वर्ष में हड्डियों की संख्यान में वृद्धि होती है। 10 से 12 वर्ष की आयु में हड्डियों में मजबूती आने लगती है।
  • दाँत (Teeth)- बाल्यावस्था के शुरुवात में दूध के दाँत गिरने लगते है। उनकी जगह पर स्थायी दाँत निकल आते है।
  • मांसपेशी (Muscles)- मांस पेशियों का भर 8 वर्ष तक कुल भर का 27% हो जाता है। बालिकाओं की मांस पेशी बालकों की अपेक्षा अधिक विकसित होती है।
  • अन्य अंगों का विकास (Devlopment of other organs)- बाल्यावस्था में मस्तिष्क आकार एवं तौल की दृष्टि से पूर्ण विकसित हो जाता है। बाल्यावस्था में सिर के आकार में क्रमशः परिवर्तन होता रहता है।

बाल्यावस्था में मानसिक विकास(Mental development in childhood)-:

बालक की शारीरिक आयु के साथ-साथ मानसिक विकास भी होने लगता है। बच्चे स्कूल जाने लगते है। इस कारण उन्हे मानसिक विकास के अधिक अवसर मिलते है।

  • इस अवस्था में बालक समझने,स्मरण करने,विचार करने, समस्या समाधान करना, निर्णय लेने आदि की क्षमता है।
  • वह छोटी घटनाओं का वर्णन करने लगता है।
  • बच्चों को विभिन्न वस्तुओं को एकत्रित करना। कागज, लकड़ी आदि से नई-नई  वस्तुओं को बनाने में रुचि लेने लगता है।
  • बच्चे समूह में रहना पसंद करते है।
  • बाल्यावस्था में बच्चे खेलना पहेली बुझाना आदि क्रिया कलापों में रुचि लेने लगते है।
  • बाल्यावस्था में में बच्चे पर्यावरण को समझने लगते है। और आत्मविश्वास बढ़ने लगता है।

किशोरावस्था में शारीरिक विकास (Physical development in adolescence)-:

किशोरावस्था जीवन का सबसे कठिन काल होता है। “किशोरावस्था परिवर्तन की अवस्था कहलाती है”। इस अवस्था में बालक एवं बालिकाओं में विकास तीव्र गति से होता है। बालकों में विकास का 14 वर्ष तक, एवं बालिकाओं में विकास की तीव्रतम वृद्धि का संमय 11 से 18 वर्ष तक होता है।

  • आकार – इस अवस्था में लंबाई तीव्रतम गति से बढ़ता है।
  • भार- इस अवस्था में बालक का भार बालिकाओं के भार से अधिक होता है।
  • सिर एवं मस्तिष्क- इस अवस्था में सिर एवं मस्तिष्क का विकास जारी रहता है। 15 से 16वर्ष की आयु में सिर का लगभग पूर्ण विकास हो जाता है। एवं मस्तिष्क का भार 1200 से 1400 ग्राम के बीच होता है।
  • हड्डियाँ- किशोरावस्था में हड्डियाँ मजबूत हो जाती है। तथा कुछ हड्डियाँ एक दूसरे से जुड़ जाती है।
  • अन्य अंगों का विकास- इस अवस्था में आँख, कान नाक त्वचा, स्वाद एवं कर्म की इंद्रियाँ का पूरा विकास हो जाता है। मस्तिष्क का लगभग पूरा हो जाता है।
  • विभिन्न ग्रंथियों का विकास- किशोरावस्था में विभिन्न परिवर्तनों का आधार अन्तः स्रावी ग्रंथियां होती है। जिनमे पिट्यूटरी, थायरॉयड,एड्रीनल ग्रंथियां प्रमुख है। इन ग्रंथियां के सराव शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित करते है।

किशोरावस्था में मानसिक विकास( Mental development इन adolescence)-:

  • किशोरावस्था में मानसिक विकास अपनी उच्च सीमाओं को छू लेता है।
  • किशोर एवं किशोरी की स्मरण शक्ति में स्थायी गुण आने लगता है। विश्लेषण करना, संश्लेषण, अमूर्त चिंतन, समस्या समाधान का निराकरण करने के लिए मानसिक विकसित हो जाता है।
  • किशोरावस्था मे कल्पना शक्ति बढ़ जाती है। कभी-कभी दिवा स्वप्न भी देखने लगते है।
  • किशोरावस्था में शब्द भंडार बढ़ जाता है। कल्पनाशक्ति के साथ वाक्पटुता भी विकसित हो जाती है।
  • किशोरावस्था में रुचि बढ़ने लगती है, आकर्षक व्यक्तित्व, वेशभूषा, पढ़ाईलिखाई, पौष्टिक भोजन, खेलकूद, कंप्यूटर इंटरनेट आदि में विशेष रुचि हो जाती है।

बाल विकास की अवस्थाएं के अंतर्गत बुद्धि-:

बालक अथवा बलकाओं के मानसिक योग्यताओं का पता लगाने के लिए हम उनकी बुद्धि का पता लगते है। हम अक्सर यह कहते है की अमुक वीकटीई बहुत बुद्धिमान व् दूसरा व्यक्ति कम बुद्धिमान है। सामान्यतः सीखने, तर्क करने, कल्पना करने व् अमूर्त चिंतन करने की योग्यता बुद्धि कहलाती है।

मनोवैज्ञानिक के अनुसार बुद्धि की परिभाषाएं-:

वुडवर्थ के अनुसार- बुद्धि कार्य करने की विधि है।

टरमन के अनुसार- बुद्धि अमूर्त विचारों के बारें में सोचने की योग्यता है।

बिने के अनुसार- बुद्धि इन चार शब्दों में निहित है- ज्ञान, आविष्कार, निर्देश, और आलोचना।

रायबर्न के अनुसार – बुद्धि वह शक्ति है जो हमको समस्याओं का समाधान करने और उद्देश्यों को प्राप्त करने की क्षमता देती है।

बुद्धि में विभिन्न प्रकार की योग्यताएं आ जाती है-

  • सीखने की योग्यता।
  • अमूर्त चिंतन करने की योग्यता।
  • समस्या का समाधान करने की योग्यता।
  • अनुभव से लाभ उठाने की योग्यता।

बाल विकास की अवस्थाएं के अंतर्गत बुद्धि लब्धि (I.Q.)-:

विभिन्न मानसिक योग्यताओं परीक्षणों के माध्यम से हम व्यक्ति की मानसिक आयु का पता लगा लेते है। बालक की बुद्धि लब्धि निकालने के लिए निम्न सूत्र का उपयोग करते है-:

बुद्धि लब्धि = मानसिक आयु x100/वास्तविक आयु

बुद्धि लब्धि से व्यक्ति की बुद्धि का पता लगाने के टरमन नामक मनोवैज्ञानिक ने निम्न वर्गीकरण का प्रस्तुत किया है-

बुद्धि लब्धि बुद्धि के प्रकार (Genius)
140 या उससे अधिक प्रतिभाशाली(Genius)
120 से 140 अति श्रेष्ठ ( Very Superior)
110 से 120 श्रेष्ठ बुद्धि (Superior)
90 से 110 सामान्य बुद्धि(Avereage)
80 से 90 मंद बुद्धि (Dull Mind)
70 से 80 क्षीण बुद्धि (Feeble Mind)
70 से कम निश्चित क्षीण बुद्धि( Definelty Feeble Minded)
50 से 70 अल्प बुद्धि (Morons)
20 या 25 से 50 मूर्ख बुद्धि (Imbecile)
20 या 25 से कम महामूर्ख(Idiot)

बाल विकास की अवस्थाएं के अंतर्गत बुद्धि परीक्षण-:

किसी भी व्यक्ति की बुद्धि का पता लगाने के लिए विभिन्न प्रकार के बुद्धि परीक्षण का निर्माण किया गया है। जिन्हे दो वर्गों में बाँटा गया है-

  • वैयक्तिक बुद्धि परीक्षण
  • सामूहिक बुद्धि परीक्षण

वैयक्तिक बुद्धि परीक्षण -:परीक्षण एक समय में एक ही व्यक्ति पर किया जा सकता है। इसका आरंभ बिने ने किया है।

सामूहिक बुद्धि परीक्षण-: यह परीक्षा एक समय में अनेक व्यक्तियों की ली जाती है। इसका प्रारंभ प्रथम विश्व युद्ध के समय अमेरिका में हुआ।

वैयक्तिक व् सामूहिक दोनों प्रकार के परीक्षण के दो रूप हो सकते है-

  • भाषात्मक
  • क्रियात्मक

भाषात्मक परीक्षण-: इस परीक्षण में भाषा का प्रयोग किया जात है। इसका मुख्य उद्देश्य है की व्यक्ति को पढ़ने लिखने का कितना ज्ञान है। उसे प्रश्नों के ऊतर लिखकर गोला बनाकर गुण बनाकर या रखनकित करके देने होते है। इसमें निम्न प्रकार से प्रश्न दिए जाते है-

  • अंक गणित के प्रश्न
  • निर्देश के अनुसार प्रश्न
  • विलोम शब्द

क्रियात्मक परीक्षण-: इस परीक्षण का उपयोग उन व्यक्तियों पर किया जाता है। जिनको भाषा का ज्ञान कम होता है। या जो पढ़ना लिखना नहीं जानते है। इसमें मूर्त बुद्धि का पता लगाया जाता है। इसके अंतर्गत निम्न प्रकार के प्रश्न दिए जाते है-

  • चित्र के बिखरे टुकड़े को कर्म से लगाना।
  • भूल–भुलैया से होकर गुजरना।

बाल विकास की अवस्थाएं के अंतर्गत प्रमुख बुद्धि परीक्षणों के नाम निमन्वत है-

वैयक्तिक भाषात्मक परीक्षण ·    बिने साइमन स्केल

·    स्टैनफोर्ड बिने स्केल

वैयक्तिक क्रियात्मक परीक्षण ·    पोरटियस भूल भुलैया परीक्षण

·    वेश्लर वैलयूब टेस्ट

सामूहिक भाषात्मक परीक्षण ·    आर्मी अल्फा टेस्ट

·    सेना सामान्य वर्गीकरण टेस्ट

सामूहिक क्रियात्मक परीक्षण ·    आर्मी बीटा टेस्ट

·    शिकागो क्रियात्मक टेस्ट

बाल विकास की अवस्थाएं के अंतर्गत बुद्धि परीक्षणों की उपयोगिता-:

  • सर्वोत्तम बालक का चुनाव करने में।
  • पिछड़े बालकों का चुनाव करने में।
  • अपराधी व् समस्यात्मक बालकों का सुधार करने में।
  • बालकों का वर्गीकरण करने में।
  • बालकों की क्षमता के अनुसार कार्य करवाने में।
  • अपव्यय का निवारण करने में।
  • राष्ट्र के बालकों की बुद्धि का ज्ञान करें में।

बाल विकास की अवस्थाएं के अंतर्गत

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