भारतीय जलवायु के प्रकार एवं विशेषताएं

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भारतीय जलवायु के प्रकार एवं विशेषताएं( भारतीय जलवायु क्या है ?, मौसम का अर्थ, जलवायु का अर्थ, मौसम की क्रिया विधि, कोपेन के अनुसार भारत में जलवायु प्रदेश )

किसी विशाल क्षेत्र में लंबे समयावधि में मौसम की अवस्थाओं तथा विविधताओं का कुलयोग ही जलवायु है । जबकि मौसम एक विशेष समय में एक क्षेत्र के वायुमंडल की अवस्था को दर्शाता है। भारतीय जलवायु एवं प्रमुख विशेषताएं के अंतर्गत अध्ययन करेंगे।

भारतीयजलवायुकेप्रकारएवंविशेषताएं

 

मौसम एवं जलवायु के तत्व जैसे –”तापमान,वायुमंडलीय दाब,पवन, आर्द्रता एवं वर्षण ही होते है । मौसम की दीर्घकालिक औसत को जलवायु” कहा जाता है ।

मौसम शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द मौसिम से हुई है,जिसका शाब्दिक अर्थ है मौसम । मानसून का अर्थ है,एक वर्ष के दौरान वायु की दिशा में ऋतु के अनुसार परिवर्तन है ।

भारत की जलवायु क्या है ? : भारत की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु है।

  • इस तरह की जलवायु प्रमुख रूप से दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाती है ।
  • सामान्य प्रतिरूप में लगभग एकरूपता होते हुए भी,देश की जलवायु – अवस्था में स्पष्ट प्रादेशिक भिन्नताएं पाई जाती है ।
  • तापमान और वर्षण को लेकर देखें की एक स्थान से दूसरे स्थान एवं एक मौसम से दूसरे मौसम में किस तरह से भिन्नता है ।
  • गर्मी के समय में राजस्थान के मरुस्थल में कुछ स्थानों का तापमान 50से० तक पहुँच जाता है,एवं जम्मू कश्मीर का तापमान 20से० रहता है।
  • सर्दी के मौसम में रात में जम्मू कश्मीर में द्रास का तापमान -45से० तक हो सकता है, त्रिवनंतपुरम में यह 20०  से० हो सकता है

भारतीय जलवायु के प्रकार एवं विशेषताएं : जलवायु का अर्थ –:

जलवायु किसी स्थान या क्षेत्र विशेष की प्राकृतिक स्थिति जिसमें,वहाँ प्राणियों और वनस्पतियों का विकास होता है। ग्रीष्म – शीत को जानकारी प्रदान करने वाली स्थित,जिसका प्रभाव प्राणियों और वनस्पतियों पर पड़ता है।

भारतीय जलवायु को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक –:

  • जलवायु को नियंत्रित करने वाले कारक को दो भागों मे विभाजित करके समझा जा सकता है
  • प्रथम – स्थित एवं उच्चावच कारक
  • द्वितीय – वायुदाब एवं पवन सम्बन्धी कारक

प्रथम – स्थित एवं उच्चावच कारक के अंतर्गत अक्षांश,हिमालय पर्वत, जल और स्थल का वितरण, समुद्र तट से दूरी, समुद्र तल से ऊँचाई, उच्चावच।

  1. अक्षांश – भारत में कर्क रेखा अक्षांश मध्य भाग पश्चिम में कच्छ के रन से लेकर पूर्व में मिजोरम से होकर गुजरती है। देश का लगभग आधा भाग कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित है,जिसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र कहा जाता है । कर्क रेखा के उत्तर में स्थित शेष भाग को उपोषण कटिबंधीय क्षेत्र कहा जाता है । इस प्रकार भारत में उष्णकटिबंधीय एवं उपोषणकटिबंधीय जलवायु दोनों प्रकार की है ।
  2. हिमालय पर्वत – भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत स्थित है,जिसकी औसत ऊँचाई लगभग 6000 मीटर है । भारत का तटीय क्षेत्र विस्तृत होने के कारण इसकी अधिकतम ऊँचाई लगभग 30 मीटर है । हिमालय पर्वत मध्य एशिया से आने वाली ठंड हवाओं को भारत में प्रवेश होने से रोकता है । इन्ही पर्वतों के कारण इस क्षेत्र में मध्य एशिया की तुलना में ठंड कम पड़ती है ।

जल और स्थल का वितरण – भरत के दक्षिण में महासागर एवं उत्तर में पर्वत श्रेणी है, स्थल की अपेक्षा जल देर से गरम होता है तथा देर से ठंड होता है । जल एवं स्थल के इस विभेदी तापन के कारण

  1. भारतीय उपमहाद्वीप में कई ऋतुओं में विभिन्न वायुदाब प्रदेश विकसित हो जाते है । वायुदाब में भिन्नता मानसून पवनों के उत्क्रमण का कारण बनती है ।
  2. समुद्र तट से दूरी – लंबी तट रेखा के कारण भारत के तटीय प्रदेशों में समकारी जलवायु पाई जाती है । भारत के अंदरूनी भागों में विषम जलवायु पाई जाती है ।
  3. समुद्र तल से ऊँचाई – जब ऊँचाई में वृद्धि होती है तो तापमान में गिरावट होती है,जैसे विरल वायु के कारण पर्वतीय प्रदेश के मैदानों की तुलना में अधीत ठंडे होते है । जैसे आगरा और दार्जलिङ्ग एकही अक्षांश पर स्थित है,जबकि जनवरी में आगरा का तापमान 160सेल्सियस जबकि दारजलिङ्ग का तापमान 4सेल्सियस होता है ।
  4. उच्चावच – भारत का उच्चावच टॉमन ,वायु दाब,पवनों की गति एवं दिशा तथा ढाल की मात्रा और वितरण को प्रभावित करता है।

  द्वितीय – वायुदाब एवं पवन सम्बन्धी कारक के अंतर्गत शीतऋतु में मौसम की क्रियाविधि,एवं ग्रीष्म ऋतु में मौसम की क्रिया विधि ।

  • शीतऋतु में मौसम की क्रियाविधि-:

 

  1. धरातलीय वायुदाब एवं पवने – भारत उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनों वाले क्षेत्र में स्थित है । ये पवने उत्तरी गोलार्द्ध के उपोषण कटिबंधीय उच्च दाब पट्टियों से उत्पन्न होती है । दक्षिण कीतरफ से बहती है। कोरिआलिस बल के कारण दाहिनी ओर विक्षेपित होकर विश्वतीय निम्न दाब वाले क्षेत्रों कीतरफ बढ़ती है ।
  2. भारत की वायुदाब एवं पवन तंत्र अद्वितीय है । शीत ऋतु एमन हिमालय के उत्तर में उच्च दाब होता है । इस क्षेत्र की ठंडी शुष्क हवाएं दक्षिण में निम्न दाब वाले महासागरीय क्षेत्र के ऊपर बहती है ।
  3. कोरिआलिस बल – पृथिवी के घूर्णन के कारण उत्पन्न आभासी बल को “कोरिआलिस बल” कहा जाता है ।

 फेरल का नियम – कोरिआलिस बल के कारण पवने उत्तरी गोलार्द्ध में दाहिनी ओर एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में बाई ओरविक्षेपित हो जाती है, इसे फेरल का नियम भी कहा जाता है ।

  1. जेट धारा – जेट धारा लगभग 27से 30 ०  उत्तरी अक्षांशों के मध्य स्थित होती है । इसलिए इन्हे उपोषण कटिबंधीय पश्चिमी जेट धारा कहा जाता है । भारत में ये धाराएं ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर पूरे वर्ष हिमालय के दक्षिण में प्रवाहित होती है ।
  2. पश्चिमी चक्रवातीय विक्षोभ – शीत ऋतु में उत्पन्न होने वाले पश्चिमी चक्रवातीय विक्षोभ भूमध्य सागरीय क्षेत्र से आने वाली पश्चिमी प्रवाह के कारण होता है । ये प्रायः भारत के उत्तर एवं उत्तर पश्चिम क्षेत्रों को प्रभावित करती है ।
  3. उष्णकटिबंधीय चक्रवात – यह चक्रवात बंगाल की खाड़ी तथा हिन्द महासागर में उत्पन्न होती है। इन चक्रवातों से तेज गति कि हवाएं चलती है और भारी वर्ष होती है । इस चक्रवात से तमिलनाडु ,उड़ीसा आंध्र प्रदेश में भारी वर्षा करती है ।
  • ग्रीष्म ऋतु में मौसम की क्रियाविधि –:

भारतीयजलवायुकेप्रकारएवंविशेषताएं

  1. धरातलीय वायुदाब एवं पवने – ग्रीष्म ऋतु की शुरुवात मार्च से मध्य जून तक रहती है। इस समय सूर्य उत्तरायण में रहता है । तापमान में वृद्धि हो जाती है।
  2. उपमहाद्वीप के निम्न तथा उच्च दोनों ही स्तरों पर वायु परिसंचरण में उत्क्रमण हो जाता है । जुलाई के मध्य तक धरातल के निकट निम्न वायुदाब पेटी जिसे अन्तः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आई. टी. सी. जेड.) कहा जाता है ।
  3. अन्तःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र(आई.टी.सी.जेड.) – विषुवत वृत पर स्थित अन्तःउष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र एक निम्न वायु दाब वाला क्षेत्र है, इस क्षेत्र में व्यापारिक पवने मिलती है ।
  4. पूर्वी जेट प्रवाह – पूर्वी जेट प्रवाह उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को भारत में लाता है ।

भारत के मानसून की प्रकृति –:

मानसून एक  जलवायवी घटक है । दक्षिण एशियाई क्षेत्र में वर्षा के कारणो की जानकारी में मानसून के कारणो कीजानकारी सहायता प्रदान करती है। इसके प्रमुख पक्ष इस प्रकार है –:

  • मानसून का आना एवं स्थल की तरफ बढ़ना – भारत में मानसून दक्षिणी पश्चिमी मानसून केरल तट पर 1 जून को पहुंचता है । 10 और 13 जून को के मध्य आर्द्र पवने मुंबई और कोलकाता तक पहुँच जाती है ।
  • वर्षा लाने वाले तंत्र – भारत में वर्षा लाने वाले दो तंत्र प्रतीत होते है,पहला बंगाल की खाड़ी एवं दूसरा अरब सागर से उठने वाली दक्षिणी –पश्चिमी मानसून धारा ।
  • मानसून में विच्छेद – दक्षिणी –पश्चिमी मानसून काल में एक बार कुछ दिनों तक वर्षा होने के बाद यदि एक – दो या की सप्ताह तक वर्षा न हो तो इसे मानसून विच्छेद कहा जाता है ।
  • मानसून का निर्वतन – मानसून का पीछे हटने या वापस लौटना मानसून का निर्वतन कहलाता, सितंबर के प्रारम्भ उत्तरी –पश्चिमी मानसून पीछे लौटने लगता है । अक्टूबर के मध्य से तक दक्षिणी भारत को छोड़कर शेष समस्त भारत से वापस लौट जाता है । लौटते हुए मानसून पवने बंगाल की खाड़ी से जल वाष्प लेकर उत्तर पूर्वी मानसून के रूप में तमिलनाडु में वर्षा करती है ।

भारतीय ऋतुओं का विवरण –:

भारत की जलीय क्रिया कलापों के कलापों के आधार पर चार प्रकार के ऋतुओं में बाँटा जाता है। 1. शीत ऋतु 2. ग्रीष्म ऋतु 3. दक्षिणी पश्चिमी मानसून की ऋतु 4. मानसून के निवर्तन की ऋतु ।

1. शीत ऋतु –:

तापमान – उत्तरी भारत में शीत ऋतु नवंबर माह के मध्य से प्रारम्भ होती है,और उत्तर के मैदानों मे जनवरी और फरवरी महीने में अधिक ठंड पड़ती है । भारत में कई भागों में लगभग दैनिक तापमान 21सेल्सियस से कम होता है । फरवरी के निकट कैस्पियन सागर और तुर्कमेनिस्तान की ठंड भारत में कोई निश्चित शीत ऋतु नहीं होती है ।

वायु दाब एवं पवने – २२ दिसंबर को सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में सीधे मकर रेखा पर चमकता है । उत्तरी मैदान में न्यून उच्च वायु दाब विकसित हो जाता है । दक्षिण भारत में वायुदाब

उतना ज्यादा नहीं होता है । 1019 मिलिबार एवं 1013 मिलीबार की समभार रेखाएं उत्तरी –पश्चिमी भारत एवं सुदूर दक्षिण से होकर गुजरती है ।

2. ग्रीष्म ऋतु –:

तापमान – मार्च के महीने में सूर्य कर्क रेखा की तरफ बढ़ने के कारण तापमान वृद्धि होने लगती है । भारत के उत्तरी क्षेत्र में अप्रैल,मई ,जून महीने मुख्य रूप से ग्रीष्म होती है। भारत के अधिकांश क्षेत्रों मे तापमान 30से 32तक पाया जाता है ।

वायुदाब एवं पवने – भारत देश के आधे उत्तरी भाग में ग्रीष्म ऋतु में अधिक गर्मी एवं गिरता हुआ वायुदाब पाया जाता है।

ग्रीष्म ऋतु में आगमन होने वाले स्थानीय तूफान –:

  1. आम्र वर्षा –ग्रीष्म ऋतु के समाप्त होते –होते पूर्वी मानसून बौछारें पड़ती है,जिसे आम्र वर्षा कहा जाता है,जो आमों को जल्द पकाने में मदद करती है।
  2. फूलों वाली बौछार – इस वर्षा से केरल एवं पास के कहवा उत्पादक क्षेत्रों में वर्षा होती है, कहवा के फूलों के खिलने में मदद करती है।
  3. काल वैशाखी – बैसाख के महीने में असम और पश्चिम बंगाल में शाम के समय में चलने वाली भयंकर विनाशकारी वर्षायुक्त पवने है । असम इन पवनों को “बारदोली छोड़ा” भी कहा जाता है ।
  4. लू – उत्तरी मैदान में चलने वाली ये शुष्क,गरम व पीड़ादायक होती है ।

दक्षिणी-पश्चिमी मानसून (वर्षा ऋतु )-:

भारतीय जलवायु के प्रकार एवं विशेषताएं

  • ग्रीष्म ऋतु के मई महीने में उत्तर – पश्चिमी के मैदानों में तापमान की अधिकता होने के कारण निमन् वायु दाब की दशाएं ज्यादा गहराने लगती है ।
  • जून के प्रारम्भ में ये इतना ज्यादा शक्तिशाली हो जाती है,की वे हिन्दमहासागर से आने वाली दक्षिणी गोलार्द्ध की व्यापारिक पवनो को आकर्षित कर लेती है ।

दक्षिण – पूर्वी व्यापारिक पवने भूमध्य रेखा को पार कर बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर में मिल जाती है । येभारत के ऊपर विद्यमान वायु परिसंचरण में मिल जाती है।

  • भूमध्य रेखीय गरम समुद्री धाराओं के ऊपर गुजरने की वजह से ये पवने पर्याप्त मात्रा में आर्द्रता लाती है ।
  • भूमध्य रखा को पर करने पर इनकी दिशा दक्षिण – पश्चिम हो जाती है,जिसके कारण इन्हे दक्षिण पश्चिम मानसून कहा जाता है ।
  • दक्षिण –पश्चिम मानसून की ऋतु में वर्षा एकाएक प्रारम्भ हो जाती है,प्रचंड गर्जन और बिजली की कडक के साथ इन आर्द्रता भरी पवनों का अचानक चलना मानसून का “प्रस्फोट” कहा जाता है ।

स्थल या भूखंड पर मानसून दो शाखाओं में पहुँचती है –:

प्रथम – अरब सागर शाखा की मानसून पवने

द्वितीय – बंगाल की खाड़ी शाखा मानसून 

 प्रथम – अरब सागर से उठने वाली पवनों को तीन भागों में विभाजित करके समझ जा सकता है – 1. पश्चिमी घाट की तरफ जाने वाली पवने  2.नर्मदा और तापी की घाटियों के बीच गुजरने वाली पवने  3.  सौराष्ट्र प्रायद्वीप की तरफ जाने वाली पवने

1. पश्चिम घाट की तरफ जाने वाली पवने – इन की गति को पश्चिमी घाट रोकते है । ये पवने पश्चिमी घाट के ढलानों पर 900 से 1200 मीटर तक चढ़ती है,परंतु तुरंत ठंडी होकर पश्चिम के तटीय मैदानों मे 250 से 400 सेंटीमीटर के बीच भारी वर्षा करती है ।

वृष्टि छाया क्षेत्र – ये पवने पश्चिमी घाट को पर करने के बाद नीचे उतरने लगती जिसके कारण इसमें नमी समाप्त हो जाती है । जिसके कारण इससे नाम मात्र की वर्षा होती है । कम वर्षा होने के कारण यह क्षेत्र “वृष्टि – छाया क्षेत्र” कहलाता है ।

2. नर्मदा और तापी नदियों के बीच गुजरने वाली पवने – अरब सागर से उठने वाली यह मानसून की दूसरी शाखा नर्मदा और तापी नदियों के मध्य से होकर भारत में दूर तक वर्षा करती है ।

सौराष्ट्र की तरफ जाने वाली पवने – अरब सागर से उठने वाली यह मानसून की तीसरी शाखा सौराष्ट्र एवंकच्छ से टकराती है,और अरावली को लांघते हुए बहुत कम वर्षा करती है ।

द्वितीय – बंगाल की खाड़ी शाखा पवने मयमर के तट एवं बांग्लादेश के कुछ भागों से टकराती है । अराकान की पहाड़ियाँ इस शाखा के बड़े हिस्से को भारतीय उप महाद्वीप की तरफ विक्षेपित कर देती है । यह मानसून पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में दक्षिण – पश्चिम दिशा की अपेक्षा दक्षिणी व धसिनी – पोररवी दिशा से प्रवेश करती है । इसका एक भाग मेघालय में स्थित गारो,खासी,जयंतिया पहाड़ियों पर वर्षा करती है । खासी पहाड़ी पर स्थित मासिनराम विश्व की सर्वाधिक औसत वर्षा होती है।

तमिलनाडु तट वर्षा ऋतु में शुष्क क्यों रह जाता है ?-:

प्रथम – तमिलनाडु का तट बंगाल की खाड़ी शाखा के समांतर पद जाता है ।

द्वितीय – दक्षिणी – पश्चिमी मानसून की अरब सागर शाखा के वृष्टि –क्षेत्र में स्थित है ।

मानसून वर्षा की विशेषताएं –:

  • दक्षिणी – पश्चिमी मानसून से प्राप्त होने वाली वर्षा मौसमी होती है, जो जून से सितंबर के मध्य होती है ।
  • समुद्र से दूरी बढ़ने के साथ मानसून वर्षा घटने लगती है ।
  • ग्रीष्म कालीन वर्षा मूसलाधार होती है ।
  • भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में मानसून का अधिक महत्त्व है ।

मानसून का निवर्तन –:

  • मानसून के वापस लौटने की क्रिया को लौटता मानसून को मानसून का निवर्तन कहा जाता है ।
  • अक्टूबर और नवंबर महीने को भी मानसून का निवर्तन कहा जाता है ।
  • सितंबर आखिरी में सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण गंगा के मैदान पर स्थित निम्न वायु दाब की द्रोणी भी दक्षिण की तरफ बढ़ना प्रारम्भ कर देती है । जिसके कारण दक्षिणी – पश्चिमी मानसून कमजोर पड़ने लगता है ।
  • मानसून सितंबर के प्रथम सप्ताह में पश्चिमी राजस्थान से लौटता है ।
  • सितंबर के आखिरी महीने तक मानसून राजस्थान,गुजरात,पश्चिमी गंगा मैदान एवं मध्यवर्ती उच्च भूमियों से वापस लौट चुकी होती है ।

वर्षा का वितरण-:

भारत में पूरे वर्ष मे औसत वार्षिकी वर्षा लगभग 125 सेंटीमीटर है । परंतु क्षेत्रों के आधार पर यह भी कई प्रकारों में पाई जाती है ।

अधिक वर्षा वाले क्षेत्र – पश्चिमी घाट वाले क्षेत्र ,उत्तर पूर्व के उप हिमालयी क्षेत्र एवं मेघालय की पहाड़ियाँ आदि ।

मध्य वर्षा वाले क्षेत्र – गुजरात के दक्षिणी भाग ,पूर्वी तमिलनाडु, झारखंड,बिहार आदि ।

कम वर्षा वाले क्षेत्र – पश्चिमी उत्तर प्रदेश,दिल्ली,हरियाणा, पंजाब, जम्मू व कश्मीर आदि ।

भारत के जलवायु प्रदेश –:

  • भारतीय जलवायु मानसून के प्रकार की है , मौसम के तत्वों के मेल से अनेक क्षेत्रीय विभिन्नताएं प्रदर्शित होती है। यह विभिन्नताएं जलवायु के उप प्रकारों के रूपों में देखि जा सकती है । इसी के आधार पर जलवायु प्रदेश पहचाने जा सकते है ।

कोपेन ने अपने जलवायु विभाजन का आधार तापमान एवं वर्षा के मासिक मानो को रखा है ।

भारतीय जलवायु के प्रकार एवं विशेषताएं

कोपेन के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश-:

जलवायु के प्रकार क्षेत्र
Amw – लघु शुष्क वाला मानसून प्रकार   गोवा के दक्षिण में भारत का पश्चिमी तट
As – शुष्क ग्रीष्म ऋतु वाला मानसून तमिलनाडु का कोरोमंडल तट
Aw –उष्णकटीबंधीय सावन प्रकार कर्क रेखा के दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार का अधिकतर भाग
BShw- अर्ध शुष्क स्टेपी जलवायु उत्तर – पश्चिमी गुजरात, पश्चिमी राजस्थान और पंजाब के कुछ भाग
BWhw –गरम मरुस्थल राजस्थान का सबसे पश्चिमी भाग
Cwg- शुष्क शीत ऋतु वाला मानसून प्रकार गंगा का मैदान

,पूर्वी राजस्थान, उत्तरी मध्य प्रदेश,उत्तर – पूर्वी भारत का अधिकांश प्रदेश

Dfc – लघु ग्रीष्म  तथा ठंडी आर्द्र शीत ऋतु वाला जलवायु प्रदेश अरुणाचल प्रदेश
E- ध्रुवीय प्रकार जम्मू और कश्मीर, हिमांचल प्रदेश,और उत्तराखंड

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