भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रमुख तथ्य

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भारत देश को 15 अगस्त 1947 को आजादी ब्रिटिश शासन से बहुत ही कठिन संग्राम का परिणाम था,और यह संघर्ष की अवस्थाओं से गुजरने के बाद पूर्ण हुआ । 1885 से भारत के इतिहास में एक नया युग का शुरुवात हुआ । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रमुख तथ्य से भारतीय जनता में राष्ट्रीय भावना जागृति हुई । भारतीयों में ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेकने की भवना हृदय में स्थान ले लिया,यहीं से भारतीय मन में राजनीतिक जागरण अधिकाधिक उभरता चला गया ।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रमुख तथ्य

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रमुख तथ्य  : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक रूप को समझने के लिए इसे तीन अवस्थावों  में विभाजित किया जा सकता है –

प्रथम अवस्था 1885 – 1905 ई० इसमें  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई,लेकिन लक्ष्य एवं उद्देश्य अस्पष्ट था। यह आंदोलन थोड़े से शिक्षित एवं मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी वर्ग तक ही सीमित था ।

 

 

द्वितीय अवस्था 1905 ई० से 1919 ई . तक  दूसरी अवस्था में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रौढ़ हो चुकी थी,इसके लक्ष्य एवं उद्देश्य स्पष्ट थे। अब भारतीय जनता के सर्वतोमुखी सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक विकास के लिए प्रयास प्रारम्भ हो गए थे । इस अवस्था में कांग्रेस ने अपना लक्ष्य “स्वराज” रखा ।

 

 

तृतीय अवस्था 1919 -1947 इस अवस्था में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति के लिए महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक भारतीय तरीके से अहिंसात्मक असहयोग अपनाकर आंदोलन किया । यह अवस्था गॉंधी युग के नाम से जानी जाती है।

 

 

भारत में स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रमुख तथ्य : भारतीयों में राष्ट्रीयता के जन्म के प्रमुख कारण : भारत में 19 वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में एक संगठित राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ । प्रमुखता से भारत में जन्मी ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नीतियों को मुहतोड़ जबाव देने के लिए भारतीयों ने एक राष्ट्रीय भावना के रूप में सोचना प्रारम्भ कर दिया । भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना जागृति करने के लिए स्वयं ब्रिटिश शासन ने ही इसका आधार बनाया । इस राष्ट्रीयता के जन्म के प्रमुख कारण निम्न थे –

आर्थिक कारण ब्रिटिश शासन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अत्यंत विनाशकारी था । पंडित जवाहर लाल ने भारतीय दृष्टिकोण को ऐसे व्यक्त किया, “भारतीय अर्थव्यवस्था उस उच्च स्थित तक पहुँच चुकी थी जैसी की औद्योगिक क्रांति से पूर्व होनी चाहिए थी” परंतु “विदेशी राजनीतिक प्रभुत्व ने इस अर्थव्यवस्था का शीघ्र ही विनाश कर दिया और उस के बदले में कोई अनुकूल तथा रचनात्मक तत्व कुछ नहीं दिया” जिसका परिणाम था अगाध निर्धनता तथा अधः पतन । अंग्रेजों की भारत विरोधी आर्थिक नीति ने भारतीयों के मन मन में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ नफरत एवं स्वदेशी राज्य के प्रति उत्तरार्द्ध में प्रत्येक व्यक्ति ये का अनुमान लगाने का प्रयत्न किया । दादाभाई नौराजी के अनुसार 1867 – 68ई० में प्रति व्यक्ति ये २० रुपये वार्षिकी थी ,जबकि विलियम डिग्बी के अनुसार १८९९ ई० में प्रति व्यक्ति ये १८ रुपये वार्षिकी थी ।

आधुनिक शिक्षा का महत्त्व : भारत में पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति ने राष्ट्र के प्रति राष्ट्रीयता की भावना को जगाने में महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाई । अंग्रेजों ने पाश्चात्य शिक्षा के प्रचलन सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत में ब्रिटिश कार्यालयों मे क्लर्क पैदा करने हेतु किया था लेकिन भारतीयों में बर्क ,जेम्स मिल ,गलैडस्टन स्पेन्सर ,रूसो,वालटेयर आदि के विचारों ने स्वतंत्रता ,राष्ट्रीयता एवं स्वशासन की भावनाएं पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ।

आधुनिक समाचार पत्रों का उद्भव : आधुनिक समाचार पत्रों तथा प्रेस का राष्ट्रीयता के उदय में महत्त्वपूर्ण भूमिका थी भारत में राष्ट्रीय प्रेस की नीव राजा राममोहन राय ने डाली । भारत में राष्ट्रीयता एवं राजनीतिक सोच की भावना पैदा करने के लिए उन्होंने संवाद कौमुदी बंगला तथा मिरात उल अखबार फारसी का सम्पादन किया । ईश्वर चंद्र विद्यासागर राष्ट्रीय भावना से सराबोर होकर 1859ई० में साप्ताहिक पत्र सोम प्रकाश का सम्पादन किया । भारतीय समाचार पत्रों ने विश्वास बनाने एवं राष्ट्रीयता के प्रसार में प्रमुख भूमिका निभाई । दि इंडियन मिरर, दि बंगाली , दि अमृत बाजार पत्रिका,दि बॉम्बे क्रोनिकल, दि हिन्दू पैट्रियाट ,दि केसरी आदि ने ब्रिटिश शासन की गलत नीतियों की आलोचना कर भारतीयों में राष्ट्रवाद की अमिट शक्ति पैदा की । भारतीय समाचार पत्र भारतीय राष्ट्रवाद का दर्पण बन गए और लोगों को शिक्षित करने का साधन ।

 

भारतीय-स्वतंत्रता-संग्राम

सामाजिक एवं धार्मिक नवजागरण : १९ वीं शताब्दी के शिक्षित भारतीयों ने पाश्चात्य शिक्षा एवं विज्ञान के प्रकाश में जो प्राप्त किया था, अपने धर्मिक विश्वासों रीत रिवाजों तथा सामाजिक प्रथाओं का पुनः परीक्षण करना शुरू कर दिया । इसके उपरांत ब्रह्म समाज,प्रार्थना समाज,आर्य समाज , थियोसोफिकल सोसायटी एवं रामकृष्ण मिशन जैसे महान संस्था अस्तित्व में आए,जो हिन्दू धर्म में सुधार किए । स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा “स्वदेशी राज्य सर्वोपरि एवं सर्वोत्तम होता है” । स्वामी रामतीर्थ ने कहा की “मैं सशरीर भारत हूँ, सारा भारत मेरा शरीर है”।

राजनीतिक कारण : भारत में ब्रिटिश हुकूमत के पहले राजनीतिक एकीकरण का अभाव था । मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद भारतीय राज्य की सीमाये टूट गई थी । लेकिन अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना से भारत में फिर से राजनीतिक एकीकरण हुआ । इसी के फलस्वरूप राष्ट्रीयता का उदय हुआ ।

राष्ट्रीय साहित्य का प्रभाव : भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना को विकसित करने मे राष्ट्रीय साहित्य की प्रमुख भूमिका थी। आधुनिक खड़ी बोली के पितामह भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने १८७६ ई० में लिखे अपने नाटक में भारत दुर्दशा में अंग्रेजों की भारत के प्रति आक्रामक नीति का उल्लेख किया है । और अन्य भी साहित्यकार जैसे प्रताप नारायण मिश्र बालकृष्ण भट्ट आदि ने अपनी रचनाओं से भारतीयों के मन राष्ट्र की भावना को विकसित किया ।

तेज परिवहन एवं संचार संसाधनों का विकास : भारत में प्रशासनिक सुविधाएं ,सैनिक रक्षा के लिए ,और आर्थिक विकास के लिए रेल,डाक,तार आदि संचार साधनों के विकास ने भी भारत में राष्ट्रीयता की जड़ों को मजबूत किया । रेलवे ने इसमें प्रमुख भूमिका अदा किया । कार्लस मार्क्स ने भी लिखा था ,की रेलवे राष्ट्रीयता के उत्थान में सहायक होगी ।

जातिवाद का प्रभाव : १८५७ के विद्रोह का एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थित यह था की शासकों तथा शासित लोगों के बीच एक जातीय कटुता आा गई थी । इंग्लैंड की सुप्रसिद्ध व्यंग पत्रिका पंच अपने व्यंग चित्रों में भारतीयों की उपमानव जीव के रूप में प्रदर्शित करती थी जो आधा गोरिल्ला तथा आधा हबशी था और जो वरिष्ठ पाशविक शक्ति द्वारा ही नियंत्रण में रह सकता है ।

इलबर्ट बिल विवाद : भारत के सबसे लोकप्रिय वायस राय रिपन के समय में इलबर्ट बिल पारित हुआ । इस बिल जनपद सेवा के भारतीय जिला तथा सत्र न्यायाधीश को वही शक्तियां तथा अधिकार देने का प्रयत्न किया जो की उनके यूरोपीय साथियों को मिले हुए थे, यूरोपीय लोगों की प्रतिक्रिया इतनी कटु थी की वायसराय को अपना यह अधिनियम बदलना पड़ा । इस विवाद से भारतीयों के मन में राष्ट्रीयता के प्रति झलक पैदा हुई ।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं अनेक क्रांतिकारियों के द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना,1857 का विद्रोह एवं अन्य आंदोलन जैसे असहयोग आंदोलन (1920-22) ,भारत छोड़ो आंदोलन-1942 आदि ने स्वतंत्रता संग्राम अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा किया ।

FAQ-:

Q. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम अवस्था क्या है ?

A. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम अवस्था 1885ई . से 1905ई . के मध्य थी ।

Q. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दूसरी अवस्था कब से कब तक है ?

A. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दूसरी अवस्था 1905ई . से 1919 ई . तक है ।

Q. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की तीसरी अवस्था कब से कब तक है ?

A. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दूसरी अवस्था 1919 ई . से 1947 ई . तक है ।

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